एक बार की बात है, एक बहुत ही धनाढ्य परिवार का मुखिया शरीर छोड़ चला गया. उसकी विधवा और उसके बच्चों ने कमाने के बजाय बाप-दादों की संचित पूँजी पर ही मौज -मजे करना शुरू कर दिया. नौकर-चाकर खाना बनाते और बहुएं पड़ी-पड़ी खाती रहतीं.
धनवान की विधवा जब कभी-कभी बच्चों और बहुओं से पूछती कि खाना कैसा बना है तो बहुएं बड़ाई करते हुए कहतीं--बहुत ही अच्छा बना है. सिर्फ छोटी बहू कहती कि माताजी खाना तो ठीक है लेकिन बासी है.
इसी तरह बहुओं कि सासु जब कभी जेवरात या कपड़े वगैरह लाती तो अन्य सारी बहुएं बड़ी प्रसन्न होकर तारीफें करतीं. सिर्फ छोटी बहू कहती कि चीजें तो ठीक हैं लेकिन पुरानी hain.
यह सिलसिला चलता रहा. एक दिन सासु ने परेशान होकर छोटी बहू से पूछा कि वह ऐसा क्यूँ कहती है.
बहू ने समझाते हुए कहा-- माताजी हमारी रसोई में जो कुछ भी बनता है वह हमारे पुरखों कि कमाई है. इसलिए मै उसे बासी कहती हूँ.
हमारे परिवार के पुरुषों का धर्म है कि वे भी हमारे पुरखों कि तरह खुद के बूते धन पैदा करें.
इसी तरह पुरखों के कमाए हुए धन से खरीदी गईं चीजें भी पुरानी माननी चाहिए. नई चीज तो वह है जो खुद कि कमाई से आयी हुई हो.
बुधवार, 29 सितंबर 2010
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