श्री गुरूजी

श्री गुरूजी
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रविवार, 13 जून 2010

धन नहीं धन पैदा करने की विद्या दो

दुनिया में बहुत सारे लोग एक आम गलती करते हैं की वे अपने बच्चों को धन देकर निहाल करने की चेष्टा करते हैं. वे सोचते हैं की उनका संचित किया हुआ धन उनकी संतानों के लिए उपयोगी हो सकता हैं. दुर्भाग्य से माँ-बाप की यह सोच ठीक उल्टा फल देती है.
भारतीय दर्शन में एक बात सदियों से कही जाती रही है कि 'पूत सपूत तो क्या धन संचय और पूत कपूत यो क्या धन संचय'. यानी धन का संचय पूत के लिए करना कभी भी उपयोगी नहीं है.
संतान अगर सपूत है तो उसे धन मत दो. वह जितनी भी चाहिए पैदा कर लेगा. ठीक इसके विपरीत संतान अगर कपूत है तो उसे चाहे जितनी भी राशी जोड़ करके दे दो; वह उसे नष्ट कर देगा.
कुशल  माँ-बाप वे हैं जो अपने बच्चों को धन पैदा करने कि विद्या सिखाते हैं. अभागे वे हैं वे अपनी गाढ़ी कमाई बच्चों के सुपुर्द करके खुद की शेष जिंदगी जोखिम में डाल देते हैं. 
मिला हुआ धन पानेवालों में अनेकों विकार पैदा करता है. उसकी वास्तविक कीमत नहीं जानने के कारण बच्चे उसका दुरुपयोग करते है. इसके मुकाबले जब वे खुद धन पैदा करते हैं तो उनमें धन के साथ-साथ कई सद्गुण भी पैदा होते हैं. ये सद्गुण उनके काम तो आते ही हैं, माँ-बाप को भी तारने में मदद करते हैं.

शनिवार, 12 जून 2010

अपने कुएं में पानी होगा

एक बार किसी आवासीय क्षेत्र में पानी का बड़ा भारी संकट आ गया. कहीं पीने के लिए भी पानी नहीं था. तभी पता पड़ा कि नजदीकी इलाके के एक धनवान के कुएं में पानी है. लोग समूह बना कर उस धनवान से पानी मांगने के लिए गए. उस उदार आदमी ने कहा कि मैं ना सिर्फ तुम्हें पानी दूंगा बल्कि रोजगार भी दूंगा. मुझे एक और कुआँ खुदवाने कि लग रही है. तुम रोजाना समय से आ जाओ, कुआँ खोदो, मजदूरी लो और चलते समय पीने का पानी भी ले जाओ.  
लोग बड़े खुश हुए. पानी भी और रोजगार भी. वाह! क्या पैकेज है!
काम चलता रहा. इन्हीं लोगों में एक ऐसा व्यक्ति भी था जो रोजाना धनवान के लिए काम कर लेने के बाद घर जाकर अपने बाड़े में भी दो घंटे खुदाई करता था.
अगले साल देखा गया कि धनवान के तीन कुएं और भी हों गए हैं और वह चौथे पर काम करवा रहा है. पहले की तरह ही लोग अब भी काम पर आ रहें हैं और मजदूरी पा रहे हैं. उनके घरों में पानी का संकट अब भी बरकरार है. मजदूरी करने की मजबूरी अब भी उसी प्रकार से हावी है. लेकिन अकेला वह आदमी जिसने रोजाना अपने कुएं के लिए भी प्रयास किया था अब काम पर नहीं आता. उसके बाड़े में भी अब कुआं था जिसमे भरपूर पानी हों गया था. नौकरी करनेवाले "स्मार्ट" लोग अब उसके यहाँ नौकर बनने की जुगत लगा रहे थे; क्योंकि अब वह भी नए कुवेँ  खुदवा रहा था.
जय "नौकरी" जय "रोजगार."
जो आपको इस कथा का मर्म समझा सके, उसकी शरण में चले जाइये. जिंदगी बन जाएगी. नहीं जाना हो तो पता करें की नया कुआँ कहाँ खुद रहा है. वहां नौकरी की जुगत लगाइए. आपकी तकदीर में इससे बेहतर कुछ और नहीं है. 

शुक्रवार, 11 जून 2010

मुश्किल यह है कि लोग धंधे और बिजनेस के फर्क को नहीं समझ रहे

लगभग सारे ही लोग धंधे को भी बिजनेस कहने की आदत डाल चुके हैं. लेकिन इनमें बहुत फर्क है. 
  • धंधे में पैसा और समय, दोनों ही धंधा करनेवाले व्यक्ति का होता है. बिजनेस में ये दोनों ही महत्वपूर्ण तत्व अन्य लोग लगाते हैं.
  • जिसका धन होता है, जोखिम भी तो उसी का होगा. इसलिए धंधे में असीमित जोखिम होता है. इसके मुकाबले बिजनेस में बहुत सारे लोगों का थोड़ा-थोड़ा धन लगा होता है, तो जोखिम भी बँटी हुई होती है. 
  • धंधे में करनेवाले को दिन-रात एक करके काम करना पड़ता है. बिजनेस में बहुत सारे लोग अपना समय एक-दूसरे के लिए लगाते हैं. अतः सभी को सीमित मात्रा में ही काम करने की जरूरत पड़ती है.
  • डाक्टर, वकील और ऐसे ही अन्य पेशेवर भी धंधे के वर्ग में आते हैं.
  • बिजनेस नेतृत्व यानि दिशा देने का काम है, जबकि धंधा रोजमर्रा की माथापच्ची का काम होता है.
  • धंधे की कमाई की एक सीमा है. बिजनेस की कमाई सैद्धांतिक रूप से असीमित होती है. 

बुधवार, 9 जून 2010

क्या आप हेलिकोप्टर से कूद जायेंगे?

एक सवाल आपसे. इसे अपने दोस्तों और मिलनेवालों से भी पूछ सकते हैं. जबाब करीब-करीब एक सा ही मिलेगा.
प्रश्न है--अगर मैं आपको एक हजार रूपये दूं तो क्या आप हेलिकोप्टर से कूद जायेंगे?
अगर आपका जबाब हाँ है तो गुरूजी के चित्र पर जाकर क्लिक क्लिक करें.
अगर आपका जबाब ना में हैं या आप संशय में हैं तो इस लेख के शीर्षक पर जाकर क्लिक करें. 
हम सिर्फ यह साबित करना चाहते हैं कि हमें लोगों के मना करने से हताश या परेशान होने कि जरूरत नहीं है. लोग खुद ही बिना छानबीन किये तुरत और गलत फैसले करने की अपनी गन्दी आदत से परेशान हैं. 

मंगलवार, 8 जून 2010

हमें किस प्रकार के नेटवर्क के लिए काम करना चाहिए?

दुनिया में जहाँ कहीं भी नेटवर्क बिजनेस होता है, वहीँ इसके अनेकों विकल्प उपलब्ध हैं. उनमें कौन सा सही है या नहीं इसके बारे में सरसरी तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता.
फिर भी हमें उन कम्पनियों के बारे में गंभीरता से विचारना चाहिए जो रोजमर्रा के इस्तेमाल के उत्पाद बनाती और बेचती हों. किसी भी नयी संस्था को सपोर्ट करने के बजाय हमें कम-से-कम एक साल इंतजार करके उनकी कार्यविधि और स्थिरता का विचार  कर लेना चाहिए. पांच साल या उससे अधिक पुरानी कम्पनियाँ भरोसे के लायक हो सकती हैं.
इन बिन्दुओं पर विचार अवश्य करें---
  •  प्रोमोटर -- किन लोगों ने कंपनी शुरू की है.
  • पालिसी -- कंपनी खुद के धंधे पर जोर दे रही है या आपके आर्थिक विकास पर.
  • प्रोडक्ट -- कंपनी के उत्पाद बार-बार जरूरत में आनेवाले होने चाहिए. (साबुन, तेल शेम्पू, पोषाहार  ........इत्यादि).
  • प्राइसिंग -- कंपनी के उत्पादों की कीमतें लोगों की आसान पहुँच की सीमा में होने चाहिए. 

सोमवार, 7 जून 2010

लोग आपके बिजनेस में पैसा क्यों लगायेंगे?

महाशिव एस्टेट के संस्थापक और कई देशों में प्रापर्टी बिजनेस के सफल संचालक श्री चंदुलाल जी गेरोटा से एक MBA के विद्यार्थी ने पूछा कि इतने सारे लोग आपके बिजनेस में पैसा लगाते हैं; इसका राज क्या है? अगर मैं भी बिजनेस शुरू करूँ तो लोग मेरे बिजनेस में पैसे क्यों लगायेंगे?
श्री चंदुलाल जी का जबाब था: बिजनेस करनेवाले सफल लोग अपने निवेशकों की पूँजी की सुरक्षा करने की कला सीखते हैं. जो अपने निवेशकों के हितों की रक्षा करना जानता है, उसके बिजनेस में पैसा लगानेवालों की कोई कमी नहीं आती. 
आप बैंकों को देख लें. मामूली से ब्याज देनेवाले बैंकों में लोग अपना बहुत सारा धन इसलिए रखते हैं कि उन्हें भरोसा है- बैंक उनकी पूँजी कि सुरक्षा करेंगे.