एक बार किसी आवासीय क्षेत्र में पानी का बड़ा भारी संकट आ गया. कहीं पीने के लिए भी पानी नहीं था. तभी पता पड़ा कि नजदीकी इलाके के एक धनवान के कुएं में पानी है. लोग समूह बना कर उस धनवान से पानी मांगने के लिए गए. उस उदार आदमी ने कहा कि मैं ना सिर्फ तुम्हें पानी दूंगा बल्कि रोजगार भी दूंगा. मुझे एक और कुआँ खुदवाने कि लग रही है. तुम रोजाना समय से आ जाओ, कुआँ खोदो, मजदूरी लो और चलते समय पीने का पानी भी ले जाओ.
लोग बड़े खुश हुए. पानी भी और रोजगार भी. वाह! क्या पैकेज है!
काम चलता रहा. इन्हीं लोगों में एक ऐसा व्यक्ति भी था जो रोजाना धनवान के लिए काम कर लेने के बाद घर जाकर अपने बाड़े में भी दो घंटे खुदाई करता था.
अगले साल देखा गया कि धनवान के तीन कुएं और भी हों गए हैं और वह चौथे पर काम करवा रहा है. पहले की तरह ही लोग अब भी काम पर आ रहें हैं और मजदूरी पा रहे हैं. उनके घरों में पानी का संकट अब भी बरकरार है. मजदूरी करने की मजबूरी अब भी उसी प्रकार से हावी है. लेकिन अकेला वह आदमी जिसने रोजाना अपने कुएं के लिए भी प्रयास किया था अब काम पर नहीं आता. उसके बाड़े में भी अब कुआं था जिसमे भरपूर पानी हों गया था. नौकरी करनेवाले "स्मार्ट" लोग अब उसके यहाँ नौकर बनने की जुगत लगा रहे थे; क्योंकि अब वह भी नए कुवेँ खुदवा रहा था.
जय "नौकरी" जय "रोजगार."
जो आपको इस कथा का मर्म समझा सके, उसकी शरण में चले जाइये. जिंदगी बन जाएगी. नहीं जाना हो तो पता करें की नया कुआँ कहाँ खुद रहा है. वहां नौकरी की जुगत लगाइए. आपकी तकदीर में इससे बेहतर कुछ और नहीं है.
शनिवार, 12 जून 2010
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जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया कहानी अगर हम उस व्यक्ति की तरह ख़ुद कुंआं खोदने की बात समझ लें तो कुछ समस्याएं तो हल हो ही जाएंगी
जवाब देंहटाएंब्लॉग जगत में आप का स्वागत है
बधाई